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May 31, 2019, 16:24 IST

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हिंदुस्तान की सरजमीं पर कुछ सबसे महत्वपूर्ण वाकयों में से एक है सूफी खानकाहों से चलने वाली गतिविधियां। अक्सर प्रजा की भलाई के लिए, खुदा की इबादत के लिए, अन्य सामाजिक कार्यों के लिए इन खानकाहों का बेहतर इस्तेमाल हुआ। सूफी संतों की दयानतदारी की पूरी दुनिया कायल रही है। नृत्य-संगीत के माहौल में इबादत की पद्धति ने उपासना को बेहद सहज बना दिया। उपासना में लीन होकर मारिफत की अवस्था पाना किसी भी सूफी के लिए बहुत आसान रहा है। उनके खानकाह इसका सबसे बड़ा जरिया हुआ करते थे..............


सूफी संतों की रवायत


हिंदुस्तान में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती से शुरू हुई सूफियाना रवायत सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के काल तक काफी हद मजबूत हो चुकी थी। इनके खानकाहों पर कव्वाली के अंदाज़ में खुदा की इबादत की जाती थी। संगीत तो सूफियों की परंपरा का मुख्य हिस्सा बनी ही, परमात्मा से एकाकार होकर फनां हो जाना भी सूफी आराधना का प्रमुख अंग बना।



अमीर खुसरो, निजामुद्दीन औलिया के समकालीन थे, जिन्होंने सात बादशाहों का काल देखा था। उन्होंने अपनी विविध रचनाओं में सूफीज्म की अवधारणा को खुलकर बयां किया है। मलिक मुहम्मद जायसी ने अपना पूरा जीवन खुदा की इबादत में ही बिताया।

अमीर खुसरो और निजामुद्दीन औलिया ने खानकाहों की सेवार्थ परंपरा को काफी आगे बढ़ाया। औलिया के रहमत में आने वाले कभी खाली हाथ नहीं जाते थे। इन्हीं खानकाहों से धर्मार्थ कार्यों के अलावा सामाजिक कार्य भी संचालित किए जाते थे। यहां बगैर किसी धार्मिक भेदभाव के सभी को आने की अनुमति थी.......हर मजहब का इंसान ईश्वर की भक्ति में लीन हो सकता था और हर किसी के साथ बराबरी का रिश्ता रखा जाता था........... वस्तुतः सूफी खानकाहों ने हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल करने में कोई भी कसर बाकी नहीं रखी


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