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Jun 19, 2017, 11:07 IST

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मिली हुई वस्तु है और बिछुड़ने वाली है |

न जीने कि इच्छा करें , न मरने की | इच्छा कोई न करें |

अनुकूलता इच्छा करने से अनुकूल परिस्थति बनी रहेगी - यह कोई नियम नहीं है |

जितना सुख भोगेंगे , उतना ही स्वभाव बिगड़ेगा |

सब संसार साक्षात् परमात्मा स्वरूप है | परन्तु जो लोग माया मोहित हैं , उन्हें इसमें गुण - दोष दीखते हैं |

गुण - दोष न देखकर भगवान को देखें तो भगवान प्रकट हो जायँगे |

सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक |

गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक || ( मानस |7 41 )

विवेकज्ञान आरम्भ है , स्वरूप अंत है |

सत - असत को अलग - अलग जानना विवेक है |

संसार का ज्ञान होने से संसार से वैराग्य हो जाता है |



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