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Jul 07, 2020, 10:30 IST

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भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया का सनातन धर्म में बहुत महत्व है जिसे आम भाषा में हरियाली तीज के नाम से जाना जाता है। प्रमुख रूप से उत्तर भारत में मनाया जाने वाला ये त्योहार शिव में आस्था और विश्वास के कई रंग समेटे हुए है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के नाम से जाना जाता है। नाम कोई भी हो लेकिन इसका महत्व बहुत है। यह त्योहार महिलाओं में बहुत चर्चित है। हरियाली तीज को माता पार्वती और भगवान शिव के पुनर्मिलन का उत्सव माना जाता है। ऐसा क्यों कहा जाता है , इसके जानने के लिए आज आप इसके पीछे छिपी कथा जरूर जानिए। कथा से पहले इसे मनाने का तरीका और पूजन विधि जानना जरूरी है।

मुहूर्त

इस साल हरियाली तीज 23 जुलाई को मनाई जाएगी। तृतीया की तिथि 22 जुलाई शाम 7 बजकर 21 मिनट पर शुरु होगी और अगले दिन यानि 23 जुलाई को शाम 5 बजकर 2 मिनट पर खत्म हो जाएगी।

पूजन विधि

सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर, साफ कपड़े पहन लें। किसी भी पूजा के पहले संकल्प अति आवश्यक है।



इसलिए घर के मंदिर या किसी सात्विक स्थान पर बैठ जाएं और मन में पूजा का संकल्प लें। काली मिट्टी का उपयोग करते हुए भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा बनाएं। यदि आप ऐसा नहीं कर पाएं तो उनके चित्र के साथ भी पूजा शुरु कर सकते हैं। यदि आप इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती से कोई मनोकामना मांगना चाहते हैं तो उस मनोकामना को धीरे से कहें। माता पार्वती को सुहाग का सामान अपर्ण करें।

इसके बाद 'उमामहेश्वरसायुज्य सिद्धये हरितालिका व्रतमहं करिष्ये' मंत्र का जाप करें। इस मंत्र के जाप के बाद हरियाली तीज से जुड़ी पौराणिक कथा जरूर पढ़ें या सुनें।

हरियाली तीज की पौराणिक कथा

ये कथा भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन से जुड़ी है। इस कथा के अनुसार शिव जी ने माता पार्वती को याद दिलाया कि कैसे उन्होंने शिव को पति रूप में पाने के लिए 107 बार जन्म लिया था लेकिन उन्हें प्राप्त ना कर सकीं और फिर उनका जन्म हुआ पर्वतों के राजा हिमालय के घर में। 108वें जन्म में माता पार्वती ने हिमालय पर ही कठोर तप किया। अन्न,जल त्याग कर सिर्फ तप में ध्यान लगाया और कैसे निरंतर बिना मौसम या अपने स्वास्थ्य की चिंता किए कठोर तप का पालन किया। भगवान शंकर बताते हैं कि कैसे माता पार्वती की स्थिति को देखकर उनके पिता बहुत दुखी और नाराज हो गए थे। भाद्रपद तृतीय शुक्ल को पार्वती माता ने रेत से एक शिवलिंग का निर्माण किया और मुझे प्रसन्न कर लिया। इसके बाद माता पार्वती ने अपने पिता हिमालय को बताया कि कैसे उन्होंने शिव को प्रसन्न कर उन्हें विवाह के लिए मना लिया है। पर्वतराज भी प्रसन्न होकर माता पार्वती को अपने साथ ले गए और पूरी विधि विधान के साथ शिव और पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। शिव कहते हैं कि, “हे पार्वती! भाद्रपद शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के परिणाम स्वरूप हम दोनों का विवाह संभव हो सका। आगे भी इस तिथि पर इस व्रत पूरी श्रद्धा के साथ करने वाली हर स्त्री को मैं मन वांछित फल दूंगा। इस व्रत को करने वाली हर स्त्री को तुम्हारी तरह अचल सुहाग की प्राप्ति होगी।


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